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Random thoughts of Kaushal K Vidyarthee……………………..

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अपनी हिन्दी

Posted by Kaushal Kishore Vidyarthee on June 15, 2009

प्राकृत, पाली, मगधी, अवधी ने सन्यास लिया,
रामायण पश्चात, संस्कृत ने भी बनवास लिया !
शुद्ध-विशुद्ध, सभ्यता – संस्कार – संस्कृति,
समन्वय-सविनय-सम्मान, विकराल विकृति !

अपनी प्यारी हिन्दी का भी बुरा हाल हुआ,
परसों नहीं, कल नहीं, ये तो फिलहाल हुआ !

सुनिये कभी गौर से, सरकारी हिन्दी में वार्तालाप,
तो लगे जैसे, इस SMS युग में ‘रावण’ का श्राप !

इधर TV set में, “Thanda मतलब Coca-Cola”
उधर अंग्रेजी में, चाय -चटनी -औ -टिक्का बोला !

आजकल College को कौन कहता महाविद्यालय है,
दो मिनट केवल हिन्दी, मानो चढना हिमालय है !

“Hungry क्या”, या फिर, “ये दिल मांगे More”,
हिन्दी अखबारों में, Tension-Pension का शोर !

क्या असली, क्या नकली, शब्द तो जरिया है,
भावनायें प्रधान, भाषा तो बहती दरिया है !
मत रोक, मत टोक इसे, हो जायेगी मलिन ये,
पत्थर हुये अगर बड़े तो, हो जायेगी कठिन ये !

धारायें कुछ पुराने खोने, तो कुछ नये ठहरने दे,
जो सरल है, सफल है, सजल है, वही रहने दे !
करती जो भी, समावेश अपने में, करने दे,
देसी-विदेसी – परदेसी, भरती है तो, भरने दे !

Hinglish कहें, हिंग्रेजी कहें, क्या फर्क पड़ता है
‘अपनी हिन्दी’ है, कहेंगे जैसे अपना दिल कहता है !
तु बस, बेढ़ंगी बेबाकी होने की वजह खोजना छोड़ दे,
‘अपनी हिन्दी’ तो समन्दर है, बूँदें जोड़ना छोड़ दे !!

————————–कौशल किशोर विद्यार्थी

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Sarfaroshi ki Tamanna

Posted by Kaushal Kishore Vidyarthee on May 17, 2008

Sarfaroshi ki Tamanna

—–Bismil Azimabadi

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है

करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है
ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है
खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर,
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर.
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिन में हो जुनून कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से.
और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बाँधकर सर पे कफ़न,
जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम.
जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

यूँ खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसि के दिल में है.
दिल में तूफ़ानों कि टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको ना आज.
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून
तूफ़ानों से क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में ह

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कविराज लालू

Posted by Kaushal Kishore Vidyarthee on February 26, 2008

I am a big fan of Laluji, our railway minister. Today he presented the budget for the year 2008-09 and introduced many more ‘Garib Raths’. I thought that it will be very nice to put up this poem -”कविराज लालू” today only. This poem derives inspiration from his famous statements in one of his election RAILLA -”बिहार की सड़क को हेमामालिनी के गाल की तरह बना देंगे”.

कवियों की वैसे तो कोई Girlfriend नहीं होती,
मगर कहानी शुरु हो जाये तो, कभी End होती ।
वाजपेयी जी कास एक बार चर्चा तो कर दिये होते,
बहन मायावती जी, क्या उनकी पलंग नही होती ॥

यह सुन, लालूजी की भी कवि बनने की तमन्ना जाग उठी,
हेमामालिनी-हेमामालिनी बड़बड़ा रहे थे कि राबड़ी भाग उठी ।
फिर क्या, सोचे राबड़ी कहीं किसी और से मिलने जा रही है,
वो बेलन संग लौटी तो, उनको लगा हेमामालिनी आ रही है ॥

पिटने के बाद कहने लगे, तुम्हें किसी से प्यार क्यूँ नही हो जाता,
मोदी को सोनिया पसंद नहीं, सो मैं तुम्हें ही उनके पास दे आता ।
मोदीजी क्या कम थे, बोले- ‘जयललिता हमको रोज भोज पर बुलाती’,
‘मेरा तो मुसकुराना बाकी है, वरना तमिलनाडु दहेज मे मिल जाती ‘॥

निराश हो सोचे, गर कहीं राबड़ी-औ-वाजपेयी का चक्कर चल जायेगा,
एक का घुटना टूटा ही रहता है, दूसरे को मालिश-ड्यूटी मिल जायेगा ।
ये दो बेरोजगार जब साथ होंगे, तो पक्का मस्त-मस्त गुल खिलायेंगे,
और फिर कुवारों की लिस्ट मे, केवल अपने कलाम जी रह जायेंगे ॥

और, उधर धमेंद्र जी ज्यादा हल्ला किये तो, उनको पशु चारा खिलायेंगे,
फिर भी नही माने तो, सन्यासन उमा संग उनके सात फेरे लगवायेंगे ।
‘कमल’ के इन दोनो फूलों से, बिहार में ढ़ेरों रोज ‘लालटेन’ जलवायेंगे,
और ‘गरीब रथ’ मे Free Ticket पे, रेलवे Honeymoon मनवायेंगे ॥

फिर लालुजी, हेमामालिनी संग अपना ब्याह रचायेंगे,
और लालु नही, ललुवा नही, कविराज लालु कहलायेंगे ॥॥

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तू

Posted by Kaushal Kishore Vidyarthee on February 3, 2008

तू असीम है, तू अप्रतिम है,
तू ही सत्य, तू ही त्याग, तुझसे ही सम्मान है,
तू मेरा सर्वस्व है, तुझसे ही मेरा जहान है ।

तू मेरे स्वप्न में है, तू ही मेरी समृद्धि में,
तू मेरे प्रयत्न में है, तू ही मेरी सिद्धि में,
मेरी बंदिश मे तू,
मेरे हर लब्ज, हर कशिश मे तू ।

मेरा हर कजरा तेरे लिये, मेरा हर गजरा तेरे लिये,
मेरा लम्हा गुजरा तेरे लिये, मेरा लम्हा ठहरा तेरे लिये,
मेरे जीने की आदत तू,
मेरी इबारत तू, मेरी इबादत तू ।

ना कोई उद्देश्य मेरा, ना ही मेरी परिभाषा है,
तू ही मेरी जागृति, तू ही मेरी जिजीविषा है,
मेरी प्रकृति में तू, मेरी प्रवृत्ति में तू,
स्नेह की सलज्जा वृत्ति में तू ।

तू ही मेरा उपनाम है, तू ही मेरा सर्वनाम है,
मेरी हर सिफत तू, हर उल्फत मे तेरा नाम है,
हर साज, हर नगमों मे तुम ही तुम हो,
मेरे हर हसीन महकमों में तुम ही तुम हो ।

भोर की परछाई में तू, दुपहरी की तन्हाई में तू,
शाम की शहनाई मे तू, निशा की गहराई में तू,
तू अथाह आकाश है,
मेरे लिये तू ही प्रकाश है ।

मेरी कविता है तू, हर प्रेरणा तुझसे, हर अलंकार तेरे लिये,
मेरे लेखनी की सरिता तू, मन का हर रस, श्रृंगार तेरे लिये,
मेरी अर्चना तू, मेरी वंदना तू,
हर स्तुति तू, हर अनुभुति तू ।

तुम हो तो हँसी है, खुशी है, तुम हो तो अपनत्व है,
जीवन में ताजगी, उन्मादगी और मीठा ममत्व है,
मेरी तपन में तू, मेरी लगन में तू,
चहकते जहन में तू, महकते गगन में तू ।

मेरी उम्मीद, मेरे विश्वास, सब पर तेरा वर्चस्व है,
मेरे कर्म मे तू, मेरे मर्म मे तू, तू ही मेरा सर्वस्व है।
मेरे सच मे तू, मेरे झूठ में तू, तू ही मेरा सर्वस्व है,
तू असीम है, तू अप्रतिम है, तू ही मेरा सर्वस्व है ।।

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रहीम के दोहे

Posted by Kaushal Kishore Vidyarthee on January 19, 2008

I dont know whether ‘Rahim Ke Dohe’ is still in the syllabus of class VI-VII Hindi course or not but I do remember that I was asked to recite this many times in the class. Recently one of my lovely friend referred to this and I could not complete many of these lines. I looked for it on the web and here it goes…….

छिमा बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥1॥

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥2॥

दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होय॥3॥

खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान॥4॥

जो रहीम ओछो बढ़ै, तौ अति ही इतराय।
प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय॥5॥

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय॥6॥

आब गई आदर गया, नैनन गया सनेहि।
ये तीनों तब ही गये, जबहि कहा कछु देहि॥7॥

खीरा सिर ते काटिये, मलियत नमक लगाय।
रहिमन करुये मुखन को, चहियत इहै सजाय॥8॥

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह॥9॥

जे गरीब पर हित करैं, हे रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग॥10॥

जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो लगे, बढ़े अँधेरो होय॥11॥

रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवारि॥12॥

बड़े काम ओछो करै, तो न बड़ाई होय।
ज्यों रहीम हनुमंत को, गिरिधर कहे न कोय॥13॥

माली आवत देख के, कलियन करे पुकारि।
फूले फूले चुनि लिये, कालि हमारी बारि॥14॥

एकहि साधै सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहि सींचबो, फूलहि फलहि अघाय॥15॥

रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन जाहि।
उनते पहिले वे मुये, जिन मुख निकसत नाहि॥16॥

रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥17॥

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥18॥

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब।
पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब्ब॥19॥

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय॥20॥

निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाय॥21॥

रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय।
सुनि इठलैहैं लोग सब, बाटि न लैहै कोय॥22॥

रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥23॥

बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥24॥

मन मोती अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय।
फट जाये तो ना मिले, कोटिन करो उपाय॥25॥

दोनों रहिमन एक से, जब लौं बोलत नाहिं।
जान परत हैं काक पिक, ऋतु वसंत कै माहि॥26॥

रहिमह ओछे नरन सो, बैर भली ना प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँति विपरीत॥27॥

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥28॥

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥29॥

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटनवारे को लगै, ज्यौं मेंहदी को रंग॥30॥

-रहीम

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सतपुड़ा के घने जंगल

Posted by Kaushal Kishore Vidyarthee on January 19, 2008

This Poem -’Satpura ke Ghane Jungle’, written by Bhawani Prasad Mishr, was one of my most favourite one during my school days. I derive lots of inspiration from Bhwani Ji’s style of writing.

सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए-से,
ऊँघते अनमने जंगल।
झाड़ ऊँचे और नीचे

चुप खड़े हैं आँख मींचे,
घास चुप है, काश चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है;
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए से
ऊँघते, अनमने जंगल!

सड़े पत्ते, गले पत्ते,
हरे पत्ते, जले पत्ते,
वन्य को पथ ढँक रहे-से,
पंक दल में पले पत्ते,
चलो इन पर चल सको तो,
दलो इनको दल सको तो,
ये घिनौने-घने जंगल,
नीद में डूबे हुए-से
ऊँघते, अनमने जंगल!

अटपटी उलझी लताएँ,
डालियों को खींच खाएँ,
पैरों को पकड़ें अचानक,
प्राण को कसलें कपाएँ,
साँप-सी काली लताएँ
बला की पाली लताएँ
लताओं के बने जंगल,
नींद में डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।

मकिड़यों के जाल मुँह पर,
और सिर के बाल मुँह पर,
मच्छरों के दंश वाले,
दाग काले-लाल मुँह पर,
वात झंझा वहन करते,
चलो इतना सहन करते,
कष्ट से ये सने जंगल,
नींद में डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।

अजगरों से भरे जंगल
अगम, गति से परे जंगल,
सात-सात पहाड़ वाले,
बड़े-छोटे बाघ वाले,
गरज और दहाड़ वाले,
कंप से कनकने जंगल,
नींद में डूबे हुए-से,
ऊँघते अनमने जंगल।
इन वनों के खूब भीतर,
चार मुर्गे, चार तीतर,
पाल कर निश्चिंत बैठे,
विजन वन के बीच बैठे,
झोंपड़ी पर फूस डाले
गोंड तगड़े और काले
जब कि होली पास आती,
सरसराती घास गाती,
और महुए से लपकती,
मत्त करती बास आती,
गूँज उठते ढोल इनके,
गीत इनके ढोल इनके।

सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल
जागते अँगडाइयों में
खोह खडडों खाइयों में
घास पागल, काश पागल,
शाल और पलाश पागल,
लता पागल, वात पागल,
डाल पागल, पात पागल,
मत्त मुर्गे और तीतर,
इन वनों के खूब भीतर!

क्षितिज तक फैला हुआ-सा
मृत्यु तक मैला हुआ-सा,
क्षुब्ध काली लहर वाला,
मथित, उत्थित जहर वाला
मेरू वाला, शेष वाला,
शंभु और सुरेश वाला,
एक सागर जानते हो?
उसे कैसे मानते हो?
ठीक वैसे घने जंगल,
नींद में डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।

धँसो इनमें डर नहीं है,
मौत का यह घर नहीं है,
उतरकर बहते अनेकों,
कल-कथा कहते अनेकों,
नदी निझर्र और नाले ,
इन वनों ने गोद पाले,
लाख पंछी सौ हिरन-दल,
चाँद के कितने किरन दल,
झूमते बन-फूल फिलयाँ,
खिल रहीं अज्ञात किलयाँ,
हिरत दूवार्, रक्त किसलय,
पूत, पावन, पूर्ण रसमय,
सतपुड़ा के घने जंगल,
लताओं के बने जंगल|
- भवानी प्रसाद मिश्र

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तुम

Posted by Kaushal Kishore Vidyarthee on November 6, 2007

तुम रोज कहती हो, तुम अच्छी नहीं हो,
मासूम हो, पगली हो, मगर बच्ची नहीं हो,
लड़ती हो, झगड़ती हो, पर सच्ची नहीं हो,

दिल से शैतान हो, पर झूठी नहीं हो,
खुद से परेशान हो, पर रूठी नहीं हो ‌

गर लगता तुझे, ये मेरी गलतफहमी है,
तो तुझे क्या सोचना, तु क्यूँ सहमी है ‌
तुम सच्ची हो, सचमुच की अच्छी हो,
क्यूँ कहती हो कि, तुम अच्छी नहीं हो ‌ ‌

जो कहना है मुझे, बस तुम कह लेने दो,
जो धुंध है मन में, उसमें ही रह लेने दो,
खशियों मे तेरी, हँसी अपनी सी लेने दो,
मुझे मेरी गलतफहमियों मे जी लेने दो ‌ ‌

इक पल सही, हर दिन आगोश मे सो लेने दो,
दिल जो करे रोने को, साथ अपने रो लेने दो,
तेरी चंचलता की खशबू में, मुझको खो लेने दो ,
तेरी बातों की जादू में, खुद को भिगो लेने दो ‌ ‌

तुम, मुझे मेरी गलतफहमियों मे जी लेने दो,
दो चार घूंट संग, मुस्कुराहटों के पी लेने दो ‌

तेरी ताजगी पे चाहे तो, रोशनी को भी निखर लेने दो,
अपनी सादगी से आज तू, चाँदनी को भी सँवर लेने दो,
गर झुक जाये फलक तो, सितारों को भी बह लेने दो,
तु इतनी प्यारी है, मुझे ये चंदा को भी कह लेने दो ‌ ‌

जो कहना है मुझे, बस तुम कह लेने दो,
मुझे मेरी गलतफहमियों मे रह लेने दो ‌ ‌ ‌ ‌

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The Chewing-Gum Generation

Posted by Kaushal Kishore Vidyarthee on July 19, 2007

The time has changed very fast in last decade in India. The economy is growing at a considerable high growth rate. Some people even claim that this is the best time to be born in India. ‘Shining India’to ‘India Rising’, ‘Poised India’ to ‘Incredible India’ type slogans has never been so catchy and visible. Revolutions after revolutions across various sectors- information technology to media to telcom to retail to steel to insurance are symbolic to up surging India on world platform. Some may say that this is not whole India. I agree. There is India of Vidarbha, Nandigram, Nithari, Godhra people etc. There is India of forty percent illiterate, of more than fifty percent of child abuse cases getting unreported. There is nothing required to add on infrastructure, health, education and disaster management sides of most of India. Whatever we say, India of today is very different (mostly in positive terms) in comparison to India of my childhood days. Today I belong to the India which has the youngest workforce in the world. In this India, there is a cohort of young people which belong to ‘chewing-gum generation’.

The ‘chewing-gum generation’ believes in chewing rather than swallowing. Why swallow-when they are so open and willing to explore. There are not like ‘Paan-Supari generation’ and are not restricted to one thing. They are jack of all trade, masters of none. Their interests have variety, their command shows versatility. They want to taste as many flavours of chewing gum as much they can. They are always on move. They are eager to learn and try many new things. They don’t like sticking to one chewing-gum for long. It is boring for them. They like new games, new software, and new gadgets. They have seen surging salary and serial job hoppers making it big through their naked eyes. They are progressive by birth. They want to work and live on their own terms. They want freshness in everything-projects to fashion style to living style. They don’t find ‘juice’ in orthodox style.

Self-centered approach with short-term immediate gains can be vividly described as their identity. World is flat for them. They can’t live even a day without mobile and without internet a week is more than a year to them. They don’t believe in saving, spending is their mantra. They see future cash-flow as resource to spend. Loan is not a bad thing for them. Decent education and job is very realistic possibilities for them. They want to fly, travel and study abroad. There is very individualistic rational for everything -office timings to work habits, dress code to sexual orientation, lifestyle issues to work-life balance. Either they belong to top 100 populous cities of India or they have studied there. They are available in plenty in today’s universities, professional institutes, coaching centres, corporate houses, BPO industries, media houses, coffee houses, shopping malls and movie halls. They are multiplying day by day.

They are very assertive about their choices. They are fearless about their aspirations. They think beyond boundaries. For them, no constraints can be justified. They have no time to think except their fun and dreams. They have no time to learn how to handle shattered dreams. They belong to the generation of opportunities, possibilities and aspirations, not of constraints. I say this generation –‘The Chewing-Gum Generation’.

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तीन शब्द

Posted by Kaushal Kishore Vidyarthee on June 21, 2007

सुबह की हर पहली किरण से
रात की कालिमा तक,
भावनाओं की हर परतों को लांघती
वो तीन शब्द ॥
इक एहसास जगाती है
कोई इसे बेमानी
तो कोई रोजमर्रा की रीत करार देती है ‌
मगर भाव तो भाव है
औ इन तीन शब्दों में बसी हर गुँज
मन की कोरों से सजी होती है,
कोई माने या ना माने
हर जवाब में वही तीन शब्द
कुछ तो कह देती है
हो ना हो, पल के लिये सही
मान लेता हूँ
जुबाँ से निकली हर आवाज झूठी नहीं होती है ‌
कुछ तो सच होगा
इस आस मे अगर बीत जाये जिंदगी तो
क्यूँ ना कहूँ
हर सुबह, हर मुलाकात मे
तीन शब्द ॥

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कुछ तो सोच लूँ

Posted by Kaushal Kishore Vidyarthee on June 21, 2007

कुछ तो सोच लूँ
कहीँ सोच कर कुछ कर लूँ
हो सकता है
सोच प्रवृत्ति बदल दे
और
प्रवृत्ति जिंदगी बदल दे
मगर
अनमने निष्प्राण सोच को
रंग कैसे दे कोई
ये तो भी सोचने को है
कुछ तो सोच लूँ ॥

वक्त बीतता चला
ठहरे पलों में माना
कुच सोच भी लिया
सोच कर बैठ जाना ही तो
नियति नहीं
सोच को हराकर
पौधे का रूप देना
आसान तो नहीं
इसे आंसा कैसे बनाया जाये
ये तो भी सोचने को है
कुछ तो सोच लूँ ॥

मान लो चल दिये
किसी डगर पर
मगर
हर डगर सीधी तो नहीं
कोई तो रोके
कोई तो टोके
बीच डगर पर
संभाले और ले चले
मंजिलें जिंदगी की
वो कौन होगा, कैसा होगा
ये तो भी सोचने को है
कुछ तो सोच लूँ ॥

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